जय जय तुलसी माता, जय जय तुलसी माता ।
सब जग की सुखदाता, वरदायनी माता ॥ जय जय...
सुर मुनि भक्त उधारिणी, दुःख दरिद्र नाशनी ।
तुलसी जी तेरी, महिमा अपरम्पार ॥ जय जय...
बटुकजनी को वर दीन्ह्यो, राम मिलायो नाम सुहायो ।
हो तुलसी कल्पवृक्षिणी, तुम हरि प्यारी ॥ जय जय...
हरि कीरति विस्तारिणी, तुम जग नन्दी ।
तुम बिन जग हरि भजनों में, फल नहीं पाए ॥ जय जय...
जो जन तुलसी पूजन करता, अन्त में वैकुण्ठ सिधारे ।
पाप ताप सब नष्ट होत हैं, पावत है गति न्यारी ॥