॥ दोहा ॥
श्री गणपति गुरुपद कमल, प्रेम सहित शीश नवाइ ।
नवग्रह चालीसा कहत, शारद होत सहाय ॥
॥ चौपाई ॥
जय जय रवि शशि सोम बुधादि । गुरु शुक्र शनिचर एकादि ॥
राहु केतु नव ग्रह कल्याणा । करहुँ अनुग्रह दीजिये ज्ञाना ॥
(१) सूर्य ॥
प्रथमहि रवि कहँ सब सिर नावें । लाल पद्म जाके शीश सुहावें ॥
जयति जयति दिनकर दिन दाता । दुःख दारिद्र्य दलन विख्याता ॥
(२) चन्द्र ॥
द्वितीय प्रणाम चन्द्र देवा । जीतै मन सेवक की सेवा ॥
श्वेत वर्ण जल राशी प्यारे । मानस सरोवर तेज निहारे ॥
(३) मङ्गल ॥
जय जय जय मङ्गल सुख कारी । मेष वृश्चिक राशि अधिकारी ॥
रक्त वर्ण भौमाय नमस्ते । दयानिधान सब सुख करते ॥
(४) बुध ॥
जय शशि नन्दन बुध महराजा । पूरण करो भक्त को काजा ॥
दिव्य रूप द्युति तेज अपारा । ज्ञान भण्डार पार न पारा ॥
(५) गुरु ॥
जयति जयति जय गुरु भगवाना । इन्द्र गुरु के तुम सब जाना ॥
धर्म कर्म के ज्ञान दिलावन । ज्ञान विज्ञान सदा के दाता ॥
(६) शुक्र ॥
जयति शुक्र ग्रह असुर गुरु प्यारे । दैत्य देव सब तुमको सराहें ॥
शुभ्र वर्ण सम चन्द्र कलाई । सकल जगत सुख शान्ति बसाई ॥
(७) शनि ॥
जय शनि पिङ्गल वर्ण सुहाये । छाया पुत्र सब जग कल्याये ॥
कृष्ण वर्ण तनु तेज अपारा । भक्तन को कोई कष्ट न न्यारा ॥
(८) राहु ॥
जय जय राहु गगनपर बासी । अर्धकाय करन ग्रह नाशी ॥
सिंहिका सुत तुम्हारो नाम । जपत नाम सब पूरन काम ॥
(९) केतु ॥
जय केतु सुरेश्वर स्वामी । सकल कार्य सिद्धि हिं दिलाने ॥
धूम्र वर्ण तन रौद्र स्वरूपा । भक्तन को सदा देहु अनुरूपा ॥
॥ दोहा ॥
नवग्रह चालीसा पाठ, ध्यान धरहि नर नित्त ।
पावत सकल प्रसिद्धि अरु, राज काज में जीत ॥