॥ दोहा ॥
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास ।
मनोकामना सिद्ध करि, पुरवहु मेरी आस ॥
॥ सोरठा ॥
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करुँ ।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका ॥
॥ चौपाई ॥
१. सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही । ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोही ॥
२. तुम समान नहिं कोई उपकारी । सब विधि पुरवहु आस हमारी ॥
३. जय जय जगत जननि जगदम्बा । सबकी तुम ही हो अवलम्बा ॥
४. तुम ही हो सब घट घट की वासी । विनती यही हमारी खासी ॥
५. जगजननी जय सिन्धु कुमारी । दीनन की तुम हो हितकारी ॥
६. विनवौं नित्य तुमहिं महारानी । कृपा करौ जग जननि भवानी ॥
७. केहि विधि स्तुति करौं तिहारी । सुधि लीजै अपराध बिसारी ॥
८. कृपा दृष्टि चितवहु मम ओरी । जगजननी विनती सुन मोरी ॥
९. ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता । संकट हरो हमारी माता ॥
१०. क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो । चौदह रत्न सिन्धु में पायो ॥
११. चौदह रत्न में तुम सुखरासी । सेवा कियो प्रभु बनि दासी ॥
१२. जब जब जन्म जहाँ प्रभु लीन्हा । रूप बदल तहँ सेवा कीन्हा ॥
१३. स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा । लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा ॥
१४. तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं । सेवा कियो हृदय पुलकाहीं ॥
१५. अपनाया तोहि अन्तर्यामी । विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी ॥
१६. तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी । कहँ लौं महिमा कहौं बखानी ॥
१७. मन क्रम वचन करै सेवकाई । मन इच्छित वांछित फल पाई ॥
१८. तजि छल कपट और चतुराई । पूजहिं विविध भाँति मनलाई ॥
१९. और हाल मैं कहौं बुझाई । जो यह पाठ करै मन लाई ॥
२०. ताको कोई कष्ट न होई । मन इच्छित पावै फल सोई ॥
२१. त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि । त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी ॥
२२. जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै । ध्यान लगाकर सुनै सुनावै ॥
२३. ताको कोई न रोग सतावै । पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै ॥
२४. पुत्रहीन अरु संपति हीना । अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना ॥
२५. विप्र बोलाय कै पाठ करावै । शंका दिल में कभी न लावै ॥
२६. पाठ करावै दिन चालीसा । ता पर कृपा करैं गौरीसा ॥
२७. सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै । कमी नहीं काहू की आवै ॥
२८. बारह मास करै जो पूजा । तेहि सम धन्य और नहिं दूजा ॥
२९. प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं । उन सम कोइ जग में कहुँ नाहीं ॥
३०. बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई । लेय परीक्षा ध्यान लगाई ॥
३१. करि विश्वास करै व्रत नेमा । होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा ॥
३२. जय जय जय लक्ष्मी भवानी । सब में व्यापित हो गुण खानी ॥
३३. तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं । तुम सम कोउ दयालु कहुँ नाहिं ॥
३४. मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै । संकट काटि भक्ति मोहि दीजै ॥
३५. भूल चूक करि क्षमा हमारी । दर्शन दीजै दशा निहारी ॥
३६. बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी । तुमहि अछत दुःख सहते भारी ॥
३७. नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में । सब जानत हो अपने मन में ॥
३८. रूप चतुर्भुज करके धारण । कष्ट मोर अब करहु निवारण ॥
॥ दोहा ॥
त्राहि त्राहि दुःख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास ।
जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश ॥