आरती युगल किशोर की कीजै ।
तन मन धन न्योछावर कीजै ॥
गौर श्याम मुख निरखत रीझै ।
प्रभु को रूप नयन भरी पीजै ॥
कञ्चन थार कपूर की बाती ।
हरि आये निर्मल भयी छाती ॥
फूलन की सेज फूलन की माला ।
रत्न सिंहासन बैठे नन्दलाला ॥
मोर मुकुट कर मुरली सोहे ।
नटवर वेष देख त्रिभुवन मोहे ॥
ओढ़े नील पीत पट सारी ।
कुञ्जबिहारी गिरिवरधारी ॥
श्री पुरुषोत्तम गिरिधर गोविन्द ।
दीन हेतु प्रकटे परमानन्द ॥
लोग कहें मैं भक्त हूँ नाहीं ।
हरि को कहाँ भक्त सम ठाहीं ॥
आरती युगल किशोर की कीजै ।
तन मन धन न्योछावर कीजै ॥